शैक्षिक कार्यक्रम
कुछ वर्ष पहले हम बौद्धिक अक्षम बच्चों की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं देते थे तथा उनका पिछले जन्मों का कर्म या इस जन्म में पिछले जन्मों का दंड कहकर छुटकारा पा लेते थे। लेकिन पिछले कुछ सालों के शोधों के द्वारा लोगों का यह भ्रम दूर हो गया है तथा इस प्रकार के बालकों के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल गया है। हम अब उनको समाज का एक अंग समझने लगे हैं तथा उनकी शिक्षा आदि के लिए भी आगे बढ़ने लगे हैं।
अच्छी आदतों का विकास : इस प्रकार के बालकों को अच्छा प्रशिक्षण दे कर उनमें अच्छी आदतों का विकास किया जा सकता है जैसे खाना- खाना स्वयं स्नान करना कपड़े बदलना तथा कपड़े पहनना आदि। बौद्धिक अक्षम बच्चों में अच्छी आदतों का विकास करके इस योग्य बनाया जा सकता है कि वह घर तथा समाज में अपने आप को समायोजित कर सके। इसलिए उनमें अच्छी आदतों का विकास करना चाहिए।
सामाजिक विकास: यह बालक सामाजिक रूप से उपेक्षित महसूस करतेे हैं समाज द्वारा इस प्रकार के बालकों को अपनाना चाहिए। खेलो तथा सामूहिक क्रियाओं के द्वारा इनमें सामाजिक गुणों का विकास करना चाहिए। उनको सामाजिक प्रशिक्षण देने से वे अपने आप को समाज में समायोजित कर सकते हैं। अतः सामाजिक प्रशिक्षण व विकास इन बालकों केे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है ।
भाषा का विकास: इस प्रकार के बालकों का विकास धीमा होताा है इसलिए ऐसे बालकों के लिए विशेष पाठ्यक्रम होना चाहिए। उचित प्रशिक्षण दिए जानेे पर इस प्रकाार के बालक संकेत तथा भाषा को समझने लगते हैं । उनकी भाषाा का विकास करना अत्यंत आवश्यक है । भाषा का विकास होने से वे अपनेे विचारों को दूसरा तक पहुंचाने में सफल हो सकते हैं।
व्यक्तिगत ध्यान: इस प्रकार के बालकों को व्यक्तिगत ध्यान की बहुत आवश्यकता होती है। व्यक्तिगत ध्यान देने से इस प्रकार के बच्चे रोजमर्रा के काम आने वाली वस्तुओं को समझने लगते हैं तथा स्वयं इनका प्रयोग करने लग जाते हैं इसलिए इन पर व्यक्तिगत ध्यान की आवश्यकता होती है ।
अभिप्रेरणा : इस प्रकार के बालकों को गीत संगीत के द्वारा जीवन में संघर्ष करने की प्रेरणा देनी चाहिए तथा उनकी किसी भी गलती को सहज लेना चाहिए। उनको डराने, धमकाने की बजाए प्यार से समझाना चाहिए ताकि जीवन के प्रति उनकी रुचि बनी रहे।
विशेष स्कूल : बौद्धिक अक्षम बच्चों के लिए विशेष विद्यालय होने चाहिए। विशेष स्कूलों में सभी बच्चे प्राय एक जैसे होते हैं तथा उनमें प्रतिस्पर्धा भी कम होती है वहां पर उनको स्वस्थ वातावरण मिलता है और वे वहां अपने आपको सुरक्षित वह समायोजित महसूस करते हैं
विशेष पाठ्यक्रम : बौद्धिक अक्षम बच्चे सामान्य बुद्धि के बालको के मुकाबले धीमी गति से सीखते हैं। इसलिए इनको धीरे धीरे इनका आत्मविश्वास जगा कर पढ़ाना चाहिए। इनको ऐसे कार्य सिखाने चाहिए जो यह बच्चे स्वतंत्र रूप से कर सके तथा अपना जीवन यापन कर सकें। इस प्रकार के पाठ्यक्रम बनाने चाहिए जो इनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हो। इनके पाठ्यक्रम सीधे तथा सरल होने चाहिए। जटिल व मुश्किल विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं करना चाहिए। जिनसे वे अधिक से अधिक लाभ उठा सकें और जीवन में आत्मनिर्भर बन सकें। पाठ्यक्रम में व्यवसायिक पक्ष पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
विशेष शिक्षण तकनीक : इस प्रकार के बालकों को पढ़ाने के लिए विशेष प्रकार की विधियों का प्रयोग करना चाहिए। इन बच्चों में चिंतन करने की योग्यता नहीं होती है। अतः उनको पढ़ाने के लिए डाल्टन विधि तथा योजना विधि का प्रयोग करना चाहिए। इन विधियों के द्वारा हाथ से कार्य करने के बल पर ज्यादा जोर दिया जाता है इनको शाब्दिक ज्ञान देने की अपेक्षा हाथ से कार्य करवाने पर अधिक जोर देना चाहिए।
विशेष समय सारणी : इनकी योग्यता सीमित होती है अतः समय सारणी उनकी योग्यता के आधार पर बनानी चाहिए। क्योंकि बालक अधिक समय तक लगातार नहीं बैठ सकते अतः कक्षा का समय कम होना चाहिए।
शिक्षण सामग्री : ऐसे बालकों को सुनने व देखने वाली सामग्री पर आधारित विषय पढ़ाने चाहिए ताकि उनको विषय वस्तु का पूरा ज्ञान हो सके सुनने व देखने वाली सामग्री बच्चों को अधिक अभिप्रेरित करती है व उनकी पढ़ने के प्रति रुचि बढ़ती है।
प्रशिक्षित अध्यापक : ऐसे बालकों के लिए विशेष प्रशिक्षण प्राप्त अध्यापकों का प्रबंध होना चाहिए। अध्यापक को बच्चों के मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर पढ़ाना चाहिए । अध्यापक बच्चों को अभिप्रेरित करके उनमें आत्मविश्वास पैदा करें ताकि वे अपने आप को समाज में अच्छी प्रकार से समायोजित कर सके। योग्य व प्रशिक्षित अध्यापकों द्वारा ही ऐसे बालकों का विकास संभव है । अच्छा व्यवहार ही एक कुशल अध्यापक का गुण है अतः अध्यापक को अपने व्यवहार के द्वारा छात्रों को अपने नजदीक लाना चाहिए । अध्यापक का अच्छा व्यवहार उनको सामान्य बालकों के समीप लाने में व समाज की मुख्यधारा से जुड़ने में सहायता करता है ।
धन्यवाद ।
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