विशेष शिक्षा का इतिहास-
पहले लोगों में दिव्यांगता के संबंध में बिल्कुल नकारात्मक दृष्टिकोण रहा लेकिन समय के चलते हुए आज समाज में दिव्यांगों की जो इज्जत है वह समयानुसार लोगों के दृष्टिकोण, व्यवहार एवं आवश्यकताओं के बदलाव के परिणाम स्वरूप ही हुआ।
इसके लिए कुछ सामाजिक संस्थाएं, अभिभावकों एवं सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। जिसके तहत दिव्यांगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है। आइए हम विशेष शिक्षा के युगों के अनुसार समझने की कोशिश करते हैं-
विशेष शिक्षा के युग:
- बहिष्कार का युग: यह पूर्णता बहिष्कार का युग था । इस युग में विशेष बच्चों को समाज पर बोझ समझा जाता था तथा समाज द्वारा बहुत ही भयानक तरीकों से दिव्यांग बच्चों का बहिष्कार किया जाता था ।
- मनोरंजन के साधन के रूप में सामाजिक स्वीकृति का युग: इस युग में दिव्यांग बच्चों व व्यक्तियों का समाज द्वारा मनोरंजन के साधन के रूप में स्वीकार किया गया और उन्हें भिखारी जोकर और दास बनने को मजबूर किया गया।
- कानूनी भेदभाव, निषेध और जादू टोने का युग: मध्य युग में चर्च ने दिव्यांग व्यक्तियों की देखभाल की जिम्मेदारी लेते हुए उन्हें आश्रय प्रदान किया। सामाजिक अधिकारों को दिव्यांगों को पहुंचाने के लिए कुछ कानून बनाए गए परंतु यह सभी कानून भेदभाव पूर्ण थे। समाज में इन दिव्यांगों को जादू - टोने द्वारा ठीक किए जाने का अंधविश्वास प्रचलित था
- सहानुभूति और विभिन्न संस्थानों में आश्रय प्रदान करने का युग: इस युग में दिव्यांग व्यक्ति मनोरंजन या संदेह के विषय की बजाएं सहानुभूति का विषय बन कर रह गए। दिव्यांगों को सरंक्षण और खुला आश्रय प्रदान करने के लिए प्रयास किए जाने लगे ।
- पृथक व्यवस्था का युग: धीरे धीरे समाज को दिव्यांग व्यक्तियों की क्षमताओं में विश्वास होने लगा। जिसके फलस्वरूप विशेष विद्यालय की स्थापना होने लगी और विशेष शिक्षा की एक शाखा के रूप में स्वीकार किया गया।
- समेकित शिक्षा की व्यवस्था का युग: इस युग में दिव्यांग व्यक्तियों कि प्रत्येक शिक्षा पर बल ना देकर, सामान्य विद्यालयों में विशेष कक्षाओं का प्रबंध किया जाने लगा और इसका परिणाम समेकित शिक्षा के रूप में उभर कर सामने आया।
- समावेशित शिक्षा की व्यवस्था का युग: यह युग दिव्यांग व्यक्तियों के लिए आशा की किरण बन कर आया । समावेशित शिक्षा के अंतर्गत सभी प्रकार के सामान्य एवं विशेष बच्चों को एक साथ नियमित कक्षा कक्ष में शिक्षण की व्यवस्था की गई है । इस प्रकार दिव्यांग जनों का समावेशन कर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य किया जा रहा है जिससे वह समाज के उत्पादक वर्ग के रूप में अपनी भूमिका निभा सकें ।
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